साईं बाबा के अनमोल वचन

sai anmol vachan

Quote 1: Why fear when I am here?

In Hindi :मेरे रहते डर कैसा?

Sai Baba साईं बाबा 

Quote 2: I am formless and everywhere.

In Hindi :मैं निराकार हूँ और सर्वत्र हूँ.

Sai Baba साईं बाबा 

Quote 3: I am in everything and beyond. I fill all space.

In Hindi :मैं हर एक वस्तु में हूँ और उससे परे भी. मैं सभी रिक्त स्थान को भरता हूँ.

 Sai Baba साईं बाबा 

Quote 4: All that you see taken together is Myself.

In Hindi :आप जो कुछ भी देखते हैं उसका संग्रह हूँ मैं.

Sai Baba साईं बाबा 

Quote 5: I do not shake or move.

In Hindi :मैं डगमगाता या हिलता नहीं हूँ.

 Sai Baba साईं बाबा 

Quote 6: If one devotes their entire time to me and rests in me, need fear nothing for body and soul.

In Hindi :यदि कोई अपना पूरा समय मुझमें लगाता है और मेरी शरण में आता है तो उसे अपने शरीर या आत्मा के लिए कोई भय नहीं होना चाहिए.

Sai Baba साईं बाबा 

Quote 7: If one sees me and me alone and listens to my Leelas and is devoted to me alone, they will reach God.

In Hindi :यदि कोई सिर्फ और सिर्फ मुझको देखता है और मेरी लीलाओं को सुनता है और खुद को सिर्फ मुझमें समर्पित करता है तो वह भगवान तक पंहुच जायेगा.

 Sai Baba साईं बाबा

Quote 8: My business is to give blessings.

In Hindi :मेरा काम आशीर्वाद देना है.

 Sai Baba साईं बाबा 

Quote 9: I get angry with none. Will a mother get angry with her children? Will the ocean send back the waters to the several rivers?

In Hindi :मैं किसी पर क्रोधित नहीं होता. क्या माँ अपने बच्चों से नाराज हो सकती है ? क्या समुद्र अपना जल वापस नदियों में भेज सकता है ?

Sai Baba साईं बाबा 

Quote 10: I will take you to the end.

In Hindi :मैं तुम्हे अंत तक ले जाऊंगा.

Sai Baba साईं बाबा 

Quote 11: Surrender completely to God.

In Hindi :पूर्ण रूप से ईश्वर में समर्पित हो जाइये.

 Sai Baba साईं बाबा 

Quote 12: If you make me the sole object of your thoughts and aims, you will gain the supreme goal.

In Hindi :यदि तुम मुझे अपने विचारों और उद्देश्य की एकमात्र वस्तु रक्खोगे , तो तुम सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त करोगे.

Sai Baba साईं बाबा 

Quote 13: Trust in the Guru fully. That is the only sadhana.

In Hindi: अपने गुरु में पूर्ण रूप से विश्वास करें. यही साधना है.

Sai Baba साईं बाबा 

Quote 14: I am the slave of my devotee.

In Hindi :मैं अपने भक्त का दास हूँ.

 Sai Baba साईं बाबा 

Quote 15: Stay by me and keep quiet. I will do the rest.

In Hindi :मेरी शरण में रहिये और शांत रहिये. मैं बाकी सब कर दूंगा.

 Sai Baba साईं बाबा 

Quote 16: What is our duty? To behave properly. That is enough.

In Hindi :हमारा कर्तव्य क्या है? ठीक से व्यवहार करना. ये काफी है.

 Sai Baba साईं बाबा 

Quote 17: My eye is ever on those who love me.

In Hindi :मेरी दृष्टि हमेशा उनपर रहती है जो मुझे प्रेम करते हैं.

Sai Baba साईं बाबा 

Quote 18: Whatever you do, wherever you may be, always bear this in mind: I am always aware of everything you do.

In Hindi :तुम जो भी करते हो, तुम चाहे जहाँ भी हो, हमेशा इस बात को याद रखो: मुझे हमेशा इस बात का ज्ञान रहता है कि तुम क्या कर रहे हो.

Sai Baba साईं बाबा 

Quote 19: I will not allow my devotees to come to harm.

In Hindi :मैं अपने भक्तों का अनिष्ट नहीं होने दूंगा.

Sai Baba साईं बाबा 

Quote 20: If a devotee is about to fall, I stretch out my hands to support him or her.

In Hindi :अगर मेरा भक्त गिरने वाला होता है तो मैं अपने हाथ बढ़ा कर उसे सहारा देता हूँ.

 Sai Baba साईं बाबा 

Quote 21: I think of my people day and night. I say their names over and over.

In Hindi : मैं अपने लोगों के बारे में दिन रात सोचता हूँ. मैं बार-बार उनके नाम लेता हूँ.

Sai Baba साईं बाबा

छठ पूजा (Chhath Puja)

chath puja

सूर्य षष्टी महात्मय (Surya Sasthi Mahatmya)

भगवान सूर्य जिन्हें आदित्य भी कहा जाता है वास्तव एक मात्र प्रत्यक्ष देवता हैं. इनकी रोशनी से ही प्रकृति में जीवन चक्र चलता है. इनकी किरणों से ही धरती में प्राण का संचार होता है और फल, फूल, अनाज, अंड और शुक्र का निर्माण होता है. यही वर्षा का आकर्षण करते हैं और ऋतु चक्र को चलाते हैं. भगवान सूर्य की इस अपार कृपा के लिए श्रद्धा पूर्वक समर्पण और पूजा उनके प्रति कृतज्ञता को दर्शाता है. सूर्य षष्टी या छठ व्रत इन्हीं आदित्य सूर्य भगवान को समर्पित है (Surya Shasti Chat pooja). इस महापर्व में सूर्य नारायण के साथ देवी षष्टी की पूजा भी होती है. दोनों ही दृष्टि से इस पर्व की अलग अलग कथा एवं महात्मय है. सबसे पहले आप षष्टी देवी की कथा सुनिये.

छठ व्रत कथा (Chat Vrat Katha):

एक थे राजा प्रियव्रत उनकी पत्नी थी मालिनी. राजा रानी नि:संतान होने से बहुत दु:खी थे. उन्होंने महर्षि कश्यप से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया. यज्ञ के प्रभाव से मालिनी गर्भवती हुई परंतु न महीने बाद जब उन्होंने बालक को जन्म दिया तो वह मृत पैदा हुआ. प्रियव्रत इस से अत्यंत दु:खी हुए और आत्म हत्या करने हेतु तत्पर हुए.

प्रियव्रत जैसे ही आत्महत्या करने वाले थे उसी समय एक देवी वहां प्रकट हुईं. देवी ने कहा प्रियव्रत मैं षष्टी देवी हूं. मेरी पूजा आराधना से पुत्र की प्राप्ति होती है, मैं सभी प्रकार की मनोकामना पूर्ण करने वाली हूं. अत: तुम मेरी पूजा करो तुम्हे पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी. राजा ने देवी की आज्ञा मान कर कार्तिक शुक्ल षष्टी तिथि को देवी षष्टी की पूजा की जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई. इस दिन से ही छठ व्रत का अनुष्ठान चला आ रहा है.

एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान श्रीरामचन्द्र जी जब अयोध्या लटकर आये तब राजतिलक के पश्चात उन्होंने माता सीता के साथ कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को सूर्य देवता की व्रतोपासना की और उस दिन से जनसामान्य में यह पर्व मान्य हो गया और दिनानुदिन इस त्यहार की महत्ता बढ़ती गई व पूर्ण आस्था एवं भक्ति के साथ यह त्यहार मनाया जाने लगा.

छठ व्रत विधि (Chat Vrat Vidhi)

इस त्यहार को बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश एवं भारत के पड़ोसी देश नेपाल में हर्षोल्लास एवं fनयम निष्ठा के साथ मनाया जाता है. इस त्यहार की यहां बड़ी मान्यता है. इस महापर्व में देवी षष्ठी माता एवं भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के लिए स्त्री और पुरूष दोनों ही व्रत रखते हैं. व्रत चर दिनो का होता है पहले दिन यानी चतुर्थी को आत्म शुद्धि हेतु व्रत करने वाले केवल अरवा खाते हैं यानी शुद्ध आहार लेते हैं. पंचमी के दिन नहा खा होता है यानी स्नान करके पूजा पाठ करके संध्या काल में गुड़ और नये चावल से खीर बनाकर फल और मिष्टान से छठी माता की पूजा की जाती है फिर व्रत करने वाले कुमारी कन्याओं को एवं ब्रह्मणों को भोजन करवाकर इसी खीर को प्रसाद के तर पर खाते हैं. षष्टी के दिन घर में पवित्रता एवं शुद्धता के साथ उत्तम पकवान बनाये जाते हैं. संध्या  के समय पकवानों को बड़े बडे बांस के डालों में भरकर जलाशय के निकट यानी नदी, तालाब, सरोवर पर ले जाया जाता है. इन जलाशयों में ईख का घर बनाकर उनपर दीया जालाया जाता है.

व्रत करने वाले जल में स्नान कर इन डालों को उठाकर डूबते सूर्य एवं षष्टी माता को आर्घ्य देते हैं. सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने अपने घर वापस आ जाते हैं. रात भर जागरण किया जाता है. सप्तमी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पुन: संध्या काल की तरह डालों में पकवान, नारियल, केला, मिठाई भर कर नदी तट पर लोग जमा होते हैं. व्रत करने वाले सुबह के समय उगते सूर्य को आर्घ्य देते हैं. अंकुरित चना हाथ में लेकर षष्ठी व्रत की कथा कही और सुनी जाती है. कथा के बाद प्रसाद वितरण किया जाता है और फिर सभी अपने अपने घर लट आते हैं. व्रत करने वाले इस दिन परायण करते हैं.

इस पर्व के विषय में मान्यता यह है कि जो भी षष्टी माता और सूर्य देव से इस दिन मांगा जाता है वह मुराद पूरी होती है. इस अवसर पर मुराद पूरी होने पर बहुत से लोग सूर्य देव को दंडवत प्रणाम करते हैं. सूर्य को दंडवत प्रणाम करने का व्रत बहुत ही कठिन होता है, लोग अपने घर में कुल देवी या देवता को प्रणाम कर नदी तट तक दंड देते हुए जाते हैं. दंड की प्रक्रिया इस प्रकार से है पहले सीघे खडे होकर सूर्य देव को प्रणाम किया जाता है फिर पेट की ओर से ज़मीन पर लेटकर दाहिने हाथ से ज़मीन पर एक रेखा खींची जाती है. यही प्रक्रिया नदी तट तक पहुंचने तक बार बार दुहरायी जाती है.

दीपावली पूजन कथा

लक्ष्मी जी और साहूकार की बेटी की कथा :

एक गांव में एक साहूकार था, उसकी बेटी प्रतिदिन पीपल पर जल चढाने जाती थी. जिस पीपल के पेड पर वह जल चढाती थी, उस पेड पर लक्ष्मी जी का वास था. एक दिन लक्ष्मी जी ने साहूकार की बेटी से कहा मैं तुम्हारी मित्र बनना चाहती हूँ. लडकी ने कहा की मैं अपने पिता से पूछ कर आऊंगा. यह बात उसने अपने पिता को बताई, तो पिता ने हां कर दी. दूसर दिन से साहूकार की बेटी ने सहेली बनना स्वीकार कर लिया.

दोनों अच्छे मित्रों की तरह आपस में बातचीत करने लगी. इक दिन लक्ष्मीजी साहूकार की बेटी को अपने घर ले गई. अपने घर में लक्ष्मी जी उसका दिल खोल कर स्वागत किया. उसकी खूब खातिर की. उसे अनेक प्रकार के भोजन परोसे,

मेहमान नवाजी के बाद जब साहूकार की बेटी लौटने लगी तो, लक्ष्मी जी ने प्रश्न किया कि अब तुम मुझे कब अपने घर बुलाओगी. साहूकार की बेटी ने लक्ष्मी जी को अपने घर बुला तो लिया, परन्तु अपने घर की आर्थिक स्थिति देख कर वह उदास हो गई. उसे डर लग रहा था कि क्या वह, लक्ष्मी जी का अच्छे से स्वागत कर पायेगी.

साहूकार ने अपनी बेटी को उदास देखा तो वह समझ गया, उसने अपनी बेटी को समझाया, कि तू फौरन मिट्टी से चौका लगा कर साफ -सफाई कर. चार बत्ती के मुख वाला दिया जला, और लक्ष्मी जी का नाम लेकर बैठ जा. उसी समय एक चील किसी रानी का नौलखा हार लेकर उसके पास डाल गई. साहूकार की बेटी ने उस हर को बेचकर सोने की चौकी, था, और भोजन की तैयारी की.

थोडी देर में श्री गणेश के साथ लक्ष्मी जी उसके घर आ गई. साहूकार की बेटी ने दोनों की खूब सेवा की, उसकी खातिर से लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न हुई. और साहूकार बहुत अमीर बन गया.

लक्ष्मी पूजन कथा :

एक बार की बात है, एक बार एक राजा ने एक लकडहारे पर प्रसन्न होकर उसे एक चंदन की लकडी का जंगल उपहार स्वरुप दे दिया. पर लकडहारा तो ठहरा लकडहारा, भला उसे चंदन की लकडी का महत्व क्या मालूम, वह जंगल से चंदन की लकडियां लाकर उन्हें जलाकर, भोजन बनाने के लिये प्रयोग करता था.

राजा को अपने अपने गुप्तचरों से यह बात पता चली तो, उसकी समझ में आ गया कि, धन का उपयोग भी बुद्धिमान व्यक्ति ही कर पाता है. यही कारण है कि लक्ष्मी जी और श्री गणेश जी की एक साथ पूजा की जाती है. ताकि व्यक्ति को धन के साथ साथ उसे प्रयोग करने कि योग्यता भी आयें.

श्री राम का अयोध्या वापस आना :

धार्मिक ग्रन्थ रामायण में यह कहा गया कि जब 14 वर्ष का वनवास काट कर राजा राम, लंका नरेश रावण का वध कर, वापस अयोध्या आये थे, उन्ही के वापस आने की खुशी में अयोध्या वासियो ने अयोध्या को दीयों से सजाया था. अपने भगवान के आने की खुशी में अयोध्या नगरी दीयों की रोशनी में जगमगा उठी थी.

एक अन्य कथा के अनुसार भगवान कृ्ष्ण ने दीपावली से एक दिन पहले नरकासुर का वध किया थ. नरकासुर एक दानव था और उसके पृ्थ्वी लोक को उसके आतंक से मुक्त किया था. बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रुप में भी दीपावली पर्व मनाया जाता है.

राजा और साधु की कथा : 

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार के साधु के मन में राजसिक सुख भोगने का विचार आया. इसके लिये उसने लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिये तपस्या करनी प्रारम्भ कर दी. तपस्या पूरी होने पर लक्ष्मी जी ने प्रसन्न होकर उसे मनोवांछित वरदान दे दिया. वरदान प्राप्त करने के बाद वह साधु राजा के दरबार में पहुंचा और सिंहासन पर चढ कर राजा का मुकुट नीचे गिरा दिया.

राजा ने देखा कि मुकुट के अन्दर से एक विषैला सांप निकल कर भागा. यह देख कर राजा बहुत प्रसन्न हुआ, क्योकि साधु ने सर्प से राजा की रक्षा की थी. इसी प्रकार एक बार साधु ने सभी दरबारियों को फौरन राजमहल से बाहर जाने को कहा, सभी के बाहर जाते ही, राजमहल गिर कर खंडहर में बदल गया. राजा ने फिर उसकी प्रशंसा की, अपनी प्रशंसा सुनकर साधु के मन में अहंकार आने लगा.

साधु को अपनी गलती का पता चला, उसने गणपति को प्रसन्न किया, गणपति के प्रसन्न होने पर राजा की नाराजगी दूर हो, और साधु को उसका स्थान वापस दे दिया गया. इसी लिए कहा गया है कि धन के लिये बुद्धि का होना आवश्यक है. यही कारण कि दीपावली पर लक्ष्मी व श्री गणेश के रुप में धन व बुद्धि की पूजा की जाती है.

इन्द्र और बलि कथा :

एक बार देवताओं के राजा इन्द्र से डर कर राक्षस राज बलि कहीं जाकर छुप गयें. देवराज इन्द्र दैत्य राज को ढूंढते- ढूंढते एक खाली घर में पहुंचे, वहां बलि गधे के रुप में छुपे हुए थें. दोनों की आपस में बातचीत होने लगी. उन दोनों की बातचीत अभी चल ही रही थी, कि उसी समय दैत्यराज बलि के शरीर से एक स्त्री बाहर निकली़, देव राज इन्द्र के पूछने पर स्त्री ने कह की मै, देवी लक्ष्मी हूं, और दैत्यों को छोड्कर, मेरी ओर अग्रसर क्यों हो रही हो. मैं स्वभाव वश एक स्थान पर टिककर नहीं रहती हूं,

परन्तु मैं उसी स्थान पर स्थिर होकर रहती हूँ, जहां सत्य, दान, व्रत, तप, पराक्रम तथा धर्म रह्ते है. जो व्यक्ति सत्यवादी होता है, जितेन्द्रिय होता है, ब्राह्मणों का हितैषी होत है, धम की मर्यादा का पालन करता है, उपवास व तप करता है, प्रतिदिन सूर्योदय से पहले जागता है, और समय से सोता है, दीन- दुखियों, अनाथों, वृ्द्ध, रोगी और शक्तिहीनों को सताते नहीं है.

अपने गुरुओं की आज्ञा का पालन करता है. मित्रों से प्रेम व्यवहार करता है. आलस्य, निद्रा, अप्रसन्नता, असंतोष, कामुकता और विवेकहीनता आदि बुरे गुण जिसमें नहीं होते है. उसी के यहां मैं निवास करती हूँ. इस प्रकार यह स्पष्ट है कि लक्ष्मी जी केवल वहीं स्थायी रुप से निवास करती है, जहां उपरोक्त गुण युक्त व्यक्ति निवास करते है.

करवा चौथ व्रत कथा (Karva Chauth Vrat Katha)

एक साहुकार के सात लडके और एक लडकी थी । सेठानी केसहित उसकी बहुओ और बेटी  ने करवा चौथ का व्रत रखा था । रात्रि का साहुकार के लडके भोजन करने लगे तो उन्होने अपनी बहन से भोजन के लिए कहा। इस पर बहन ने उत्तर दिया- भाई! अभी चाँद नही निकला है । उसके निकलने पर अर्ध्य देकर भोजन करूँगी। बहन की बात सुनकर भाइयो ने क्या काम किया कि नगर मे बाहर जाकर अग्नि जला दी और छलनी से जाकर उसमे से प्रकाश दिखाते हुए उन्होने बहन से कहा- बहन! चाँद निकल आया है, अर्ध्य देकर भोजन जीम लो । यह सुन उसने अपनी भाभियो से कहा कि आओ तुम भी चन्द्रमा के अर्ध्य दे लो परन्तु वे इस काण्ड को जानती थी उन्होने कहा कि बहन! अभी चाँद नही निकला, तेरे भाई तेरे से धोखा करते हुए अग्नि का प्रकाश छलनी से दिखा रहे है भाभियो की बात सुनकर भी उसने कुछ ध्यान नही दिया और भाइयो द्वारा दिखाए प्रकाश को ही अर्ध्य देकर भोजन कर लिया । इस प्रकार व्रत भंग करने से गणेश जी उस पर अप्रसन्न हो गए। इसके बाद उसका पति सख्त बीमार हो गया और जो कुछ घर मे था उसकी बीमारी मे लग गया । जब उसे अपने किए हुए दोषो का पता लगा तो उसने पश्चाताप किया। गणेश जी की प्रार्थना करते हुए विधि विधान से पुनः चतुर्थी का व्रत करना आरम्भ कर दिया । श्रद्धानुसार सबका आदर करते हुए सबसे आर्शीवाद ग्रहण करने मे ही मन को लगा दिया । इस प्रकार उसके श्रद्धा-भक्ति सहित कर्म को देखकर भगवान् गणेश उस पर प्रसन्न हो गए और उसके पति का जीवन दान दिया । उसे आरोग्य करने क पश्चात् धन-सम्पति से युक्त कर दिया। इस प्रकार जो कोई छल-कपट को त्याग कर श्रद्धा भक्ति से चतुर्थी का व्रत करेगे वे सब इस प्रकार से  सुखी होते हुए क्लेशो से मुक्त हो जायेगे।

गणेशजी विनायकजी की कहानीः  एक अन्धी बुढिया थी जिसका एक लडका था और लडके की बहु थी । वह बहुत गरीब थी । वह अन्धी बुढिया नित्यप्रति गणेशजी की पूजा करती थी । गणेशजी साक्षात् सन्मुख आकर कहते थे की बुढिया माई तु जो चाहे माँग ले । बुढिया कहती थी मुझे माँगना नही आता सो कैसे और क्यु माँगू। तब गणेशजी बोले कि अपने बहू-बेटे से पूछकर माँग लो । तब बुढिया ने अपने पुत्र और पूत्रवधू से पूछा तो बेंटा बोला कि धन माँग ले और बहु ने कहा पोता माँग ले। तब बुढिया ने सोचा की बेटा बहू तो अपने अपने मतलब की बाते कह रहे है अतः उस बुढिया ने पडोसियों से पुछा तो पडोसियो ने कहा कि बुढिया मेरी थोडी सी जिन्दगी है क्या माँगे धन और पोता, तु तो केवल अपने नेत्र माँग ले जिससे तेरी शेष जिन्दगी सुख से व्यतीत हो जाये । उस बुढिया ने बेटे और पडोसियो की बात सुनकर घर मे जाकर सोचा, जिससे बेटा बहु और सबका भला हो वह भी माँग लूँ और अपने मतलब की चीज भी माँगलो । जब दूसरे दिन श्री गणेशजी आये और बोले, बोल बुढिया क्या माँगती है हमारा वचन है जो तू माँगेगी सो ही पायेगी । गणेशजी के वचन सुनकर बुढिया बोली- हे गणेशराज! यदि आप मुझ पर प्रसन्न है तो मुझे नौ करोड की माया दे, नाती पोता दे, निरोगी काया दें, अमर सुहागदें, आँखो में प्रकाश द और समस्त परिवार को सुख दे ंऔर अन्त में मोक्ष दे। बुढिया की बात सुनकर गणेशजी बोले बुढिया माँ तुने तो मुझे ठग लिया । खैर जो कुछ तूने माँग लिया वह सभी तुझे मिलेगा । यूँ कहकर गणेशजी अन्तर्ध्यान हो गए ।

हे गणेशजी जैसे बुढिया माँ को माँगे अनुसार सब कुछ दिया है वैसे ही सबको देना और हमको देना की कृपा करना ।

कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ का व्रत किया जाता है|यह स्त्रियों का मुख्य त्यौहार है| सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत करती हैं|

विधि: एक पटटे पर जल से भरा लोटा एवं एक करवे में गेहूँ भरकर रखते हैं| दीवार पर या कागज पर चन्द्रमा उसके नीचे शिव तथा कार्तिकेय की चित्रावली बनाकर पूजा की जाती है| चन्द्रमा को देखकर अध्ये देते हैं फिर भोजन करते हैं|

करवा चौथ का उजमन: उजमन करने के लिए एक थाली को तेरह जगह चार-चार पूड़ी और थोड़ा सा सीरा राख लें|उसके ऊपर एक साडी ब्लाउज और रुपए जितना चाहें रख लें उस थाली के चारो ओर रोली, चावल से हाथ फेर कर अपनी सासू जी के पांव लगकर उन्हें दें दे| उसके बाद तेरह ब्रह्मणों को भोजन करवाए और दक्षिणा देकर तथा बिन्दी लगाकर उन्हें विदा करें|

सुन्दर कांड पाठ (Sundar Kand Path)

1. पंचम सोपान-मंगलाचरण

श्लोक :

* शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥1॥

भावार्थ:-शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणों से परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देने वाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजी से निरंतर सेवित, वेदान्त के द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, देवताओं में सबसे बड़े, माया से मनुष्य रूप में दिखने वाले, समस्त पापों को हरने वाले, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राजाओं के शिरोमणि राम कहलाने वाले जगदीश्वर की मैं वंदना करता हूँ॥1॥

* नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥2॥

भावार्थ:-हे रघुनाथजी! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अंतरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिए और मेरे मन को काम आदि दोषों से रहित कीजिए॥2॥

* अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥3॥

भावार्थ:-अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीर वाले, दैत्य रूपी वन (को ध्वंस करने) के लिए अग्नि रूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, संपूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्री रघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान्‌जी को मैं प्रणाम करता हूँ॥3

उमा-महेश्वर का व्रत कथा (Uma Maheshvar Vrat Katha)

यह व्रत भाद्रपद पूर्णिमा को किया जाता है । विधान स्नान कर भगवान शकर की प्रतिमा को स्नान कराकर विल्वपत्र, फूल आदि से पूजन करते है तथा रात्रि को मन्दिर में जागरण करना चाहीए पूजन के बाद यथाशक्ति ब्राह्यण को भोजन कराकर दान दक्षिणा देकर व्रत का समापन करना चाहीए ।

इस व्रत का उल्लेख मत्स्य पुराण में मिलता है कहा जाता है कि एक बार महर्षि दुर्वासा शकर जी के दर्शन करके लौट रहे थे। मार्ग में उनकी भेंट विष्णुजी से हो गई। महर्षि ने शंकर द्वारा दी गई विल्वपत्र की माला विष्णुजी को दे दी । विष्णु ने इस माला को स्वय के गले में पहनकर गरूड के गले डाल दीं। इससे दुर्वासा क्रोधित होकर बोले की तुमने श्कर का अपमान किया है । इससे तुम्हारे पास से लक्ष्मी चली जायेगी । क्षीर सागर से भी हाथ धोना पडेगा । शेषनाग भी तुम्हारी सहायता न कर सकेंगे । यह सुनकर विष्णुजी ने दुर्वासा को प्रणाम कर मुक्त होने का उपाय पूछा । दूर्वासा ऋषि ने बताया कि उमा-महेश्वर का व्रत करो, तभी तुम्हे ये वस्तुएँ मिलेगी। तब विष्णुजी ने उमा महेश्वर का व्रत किया व्रत के प्रभाव से लक्ष्मी आदि समस्त शापित वस्तुएँ भगवान विष्णु को पुनः मिल गई ।

गाज का व्रत (Gaaj Ka Vrat)

पुराने समय में एक राजा के कोई सन्तान नही थी। राजा रानी सन्तान के न होने पर बडे दःखी थे एक दिन रानी ने गाज माता से प्रार्थना की कि अगर मेरे गर्भ रह जाये तो मैं तुम्हारे हलवे की कडाही करूँगी। इसके बाद रानी गर्भवती हो गई। राजा के घर पुत्र पैदा हुआ। परन्तु रानी गाज माता की कडाही करना भूल गई। इस पर गाज माता क्रुद्ध हो गई एक दिन रानी का बेटा पालने मे सो रहा था। आँधी पालने सहित लडके को उडा ले गई और एक भील-भीलनी के घर पालने को रख दिया। जब भील-भीलनी जंगल से घर आए तो उन्हें अपने घर में एक लडके को पालने में सोता पाया। भील- भीलनी के कोई सन्तान न थी। भगवान का प्रसाद समझकर भील दम्पति बहुत प्रसन्न हुए।  एक धोबी राजा और भील दोनो के कपडे धोता था। धोबी राजा के महल में कपडे देने गया तो महल में शोर हो रहा था कि गाज माता लडके को उठाकर ले गई। धोबी ने बताया कि मैने आज एक लडके को भीलनी के घर में पालने मे सोते देखा है राजा ने भील दम्पति को बुलाया कि हम गाज माता का व्रत करते है गात माता ने हमे एक बेटा दिया है। यह सुनकर रानी को अपनी भूल का एहसास हो गया। रानी गाज माता से प्रार्थना करने लगी। मेरी भूल के कारण ऐसा हो गया और पश्चाताप् करने लगी। हे गाज माता मेरी भूल क्षमा कर दो। मैं आपकी कडाही अवश्य करूँगी। मेरा लडका ला दो गाज माता ने  प्रसन्न होकर उसका लडका ला दिया तथा भील दम्पति माता ने प्रसन्न होकर उसका लडका ला दिया तथा भील दम्पति का घर भी सम्पन्न हो गया तथा एक पुत्र भी प्राप्त हो गया। तब रानी ने गाज माता का श्रृंगार किया और उसकी शुद्ध घी के हलवे की कडाही की। हे गाज! माता जैसे तुमने भील दम्पति को धन दौलत और पुत्र दिया तथा रानी का पुत्र वापिस ला दिया उसी तरह हे माता! सबको धन और पुत्र देकर सम्पन्न रखना।

विधि: सात जगह चार-चार पूड़ी और हलवा रखकर उसपर कपड़ा व रुपये रखदें| एक जल के लौटे पर सतिया बनाकर ७ दाने गेहूँ के हाथ में लेकर गाज की कहानी सुनें| इसके बाद सारी पूरी औढ़नी पर रखकर सासुजी के पैर छूकर दे दें| बाद में लौटे को जल से भरकर भगवान को अर्ध्य दें| इसके बाद सात ब्रह्मणियों को भोजन कराकर दक्षिणा देकर स्वयं भोजन करें|