श्री वैष्णों देवी की गुफा में होने वाली आरती (Shri Vashno Devi Ki Gufa Main Hone Wali Aarti)

हे मात मेरी, हे मात मेर,
कैसी यह देर लगाई है दुर्गे | हे ….

भवसागर में गिरा पड़ा हूँ,
काम आदि गृह में घिरा पड़ा हूँ |
मोह आदि जाल में जकड़ा पड़ा हूँ | हे ….

न मुझ में बल है न मुझ में विद्या,
न मुझ में भक्ति न मुझमें शक्ति |
शरण तुम्हारी गिरा पड़ा हूँ | हे ….

न कोई मेरा कुटुम्ब साथी,
ना ही मेरा शारीर साथी |
आप ही उबारो पकड़ के बाहीं | हे ….

चरण कमल की नौका बनाकर,
मैं पार हुंगा ख़ुशी मनाकर |
यमदूतों को मार भगाकर | हे ….

सदा ही तेरे गुणों को गाऊँ,
सदा ही तेरे स्वरूप को ध्याऊँ |
नित प्रति तेरे गुणों को गाऊँ | हे ….

न मैं किसी का न कोई मेरा,
छाया है चारों तरफ अन्धेरा |
पकड़ के ज्योति दिखा दो रास्ता | हे ….

शरण पड़े है हम तुम्हारी,
करो यह नैया पार हमारी |
कैसी यह देर लगाई है दुर्गे | हे ….

श्री चिन्तपूर्णी देवी जी की आरती (Shri Chintpurni Devi Ji Ki Aarti)

चिन्तपूर्णी चिन्ता दूर करनी,
जन को तारो भोली माँ |

काली दा पुत्र पवन दा घोडा,
सिंह पर भई असवार, भोली माँ || १ ||

एक हाथ खड़ग दूजे में खांडा,
तीजे त्रिशूलसम्भालो, भोली माँ || २ ||

चौथे हथ चक्कर गदा पांचवे,
छठे मुण्डों दी माल भोली माँ || ३ ||

सातवें से रुण्ड-मुण्ड बिदारे,
आठवें से असुर संहारे, भोली माँ || ४ ||

चम्पे का बाग लगा अति सुन्दर,
बैठी दीवान लगाय, भोली माँ || ५ ||

हरि हर ब्रह्मा तेरे भवन विराजे,
लाल चंदोया बैठी तान, भोली माँ || ६ ||

औखी घाटी विकटा पैंडा,
तले बहे दरिया, भोली माँ || ७ ||

सुमर चरन ध्यानू जस गावे,
भक्तां दी पज निभाओ, भोली माँ || ८ ||

श्री संणु जी की आरती (Shri Sandu Ji Ki Aarti)

धूप दीप घुत साजि आरती |

वारने जाउ कमलापति || १ ||

मंगलाहरि मंगला |

नित मंगल राजा राम राई को ||

रहउ०उत्तम दियरा निरमल बाती |

तुही निरंजन कमला पाती |

रामा भगति रामानंदु जानै |

पूरन परमानन्द बखानै |

मदन मूरति भै तारि गोबिन्दे |

सैणु भणै भजु परमानन्दे |

दीपावली पूजन कथा

लक्ष्मी जी और साहूकार की बेटी की कथा :

एक गांव में एक साहूकार था, उसकी बेटी प्रतिदिन पीपल पर जल चढाने जाती थी. जिस पीपल के पेड पर वह जल चढाती थी, उस पेड पर लक्ष्मी जी का वास था. एक दिन लक्ष्मी जी ने साहूकार की बेटी से कहा मैं तुम्हारी मित्र बनना चाहती हूँ. लडकी ने कहा की मैं अपने पिता से पूछ कर आऊंगा. यह बात उसने अपने पिता को बताई, तो पिता ने हां कर दी. दूसर दिन से साहूकार की बेटी ने सहेली बनना स्वीकार कर लिया.

दोनों अच्छे मित्रों की तरह आपस में बातचीत करने लगी. इक दिन लक्ष्मीजी साहूकार की बेटी को अपने घर ले गई. अपने घर में लक्ष्मी जी उसका दिल खोल कर स्वागत किया. उसकी खूब खातिर की. उसे अनेक प्रकार के भोजन परोसे,

मेहमान नवाजी के बाद जब साहूकार की बेटी लौटने लगी तो, लक्ष्मी जी ने प्रश्न किया कि अब तुम मुझे कब अपने घर बुलाओगी. साहूकार की बेटी ने लक्ष्मी जी को अपने घर बुला तो लिया, परन्तु अपने घर की आर्थिक स्थिति देख कर वह उदास हो गई. उसे डर लग रहा था कि क्या वह, लक्ष्मी जी का अच्छे से स्वागत कर पायेगी.

साहूकार ने अपनी बेटी को उदास देखा तो वह समझ गया, उसने अपनी बेटी को समझाया, कि तू फौरन मिट्टी से चौका लगा कर साफ -सफाई कर. चार बत्ती के मुख वाला दिया जला, और लक्ष्मी जी का नाम लेकर बैठ जा. उसी समय एक चील किसी रानी का नौलखा हार लेकर उसके पास डाल गई. साहूकार की बेटी ने उस हर को बेचकर सोने की चौकी, था, और भोजन की तैयारी की.

थोडी देर में श्री गणेश के साथ लक्ष्मी जी उसके घर आ गई. साहूकार की बेटी ने दोनों की खूब सेवा की, उसकी खातिर से लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न हुई. और साहूकार बहुत अमीर बन गया.

लक्ष्मी पूजन कथा :

एक बार की बात है, एक बार एक राजा ने एक लकडहारे पर प्रसन्न होकर उसे एक चंदन की लकडी का जंगल उपहार स्वरुप दे दिया. पर लकडहारा तो ठहरा लकडहारा, भला उसे चंदन की लकडी का महत्व क्या मालूम, वह जंगल से चंदन की लकडियां लाकर उन्हें जलाकर, भोजन बनाने के लिये प्रयोग करता था.

राजा को अपने अपने गुप्तचरों से यह बात पता चली तो, उसकी समझ में आ गया कि, धन का उपयोग भी बुद्धिमान व्यक्ति ही कर पाता है. यही कारण है कि लक्ष्मी जी और श्री गणेश जी की एक साथ पूजा की जाती है. ताकि व्यक्ति को धन के साथ साथ उसे प्रयोग करने कि योग्यता भी आयें.

श्री राम का अयोध्या वापस आना :

धार्मिक ग्रन्थ रामायण में यह कहा गया कि जब 14 वर्ष का वनवास काट कर राजा राम, लंका नरेश रावण का वध कर, वापस अयोध्या आये थे, उन्ही के वापस आने की खुशी में अयोध्या वासियो ने अयोध्या को दीयों से सजाया था. अपने भगवान के आने की खुशी में अयोध्या नगरी दीयों की रोशनी में जगमगा उठी थी.

एक अन्य कथा के अनुसार भगवान कृ्ष्ण ने दीपावली से एक दिन पहले नरकासुर का वध किया थ. नरकासुर एक दानव था और उसके पृ्थ्वी लोक को उसके आतंक से मुक्त किया था. बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रुप में भी दीपावली पर्व मनाया जाता है.

राजा और साधु की कथा : 

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार के साधु के मन में राजसिक सुख भोगने का विचार आया. इसके लिये उसने लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिये तपस्या करनी प्रारम्भ कर दी. तपस्या पूरी होने पर लक्ष्मी जी ने प्रसन्न होकर उसे मनोवांछित वरदान दे दिया. वरदान प्राप्त करने के बाद वह साधु राजा के दरबार में पहुंचा और सिंहासन पर चढ कर राजा का मुकुट नीचे गिरा दिया.

राजा ने देखा कि मुकुट के अन्दर से एक विषैला सांप निकल कर भागा. यह देख कर राजा बहुत प्रसन्न हुआ, क्योकि साधु ने सर्प से राजा की रक्षा की थी. इसी प्रकार एक बार साधु ने सभी दरबारियों को फौरन राजमहल से बाहर जाने को कहा, सभी के बाहर जाते ही, राजमहल गिर कर खंडहर में बदल गया. राजा ने फिर उसकी प्रशंसा की, अपनी प्रशंसा सुनकर साधु के मन में अहंकार आने लगा.

साधु को अपनी गलती का पता चला, उसने गणपति को प्रसन्न किया, गणपति के प्रसन्न होने पर राजा की नाराजगी दूर हो, और साधु को उसका स्थान वापस दे दिया गया. इसी लिए कहा गया है कि धन के लिये बुद्धि का होना आवश्यक है. यही कारण कि दीपावली पर लक्ष्मी व श्री गणेश के रुप में धन व बुद्धि की पूजा की जाती है.

इन्द्र और बलि कथा :

एक बार देवताओं के राजा इन्द्र से डर कर राक्षस राज बलि कहीं जाकर छुप गयें. देवराज इन्द्र दैत्य राज को ढूंढते- ढूंढते एक खाली घर में पहुंचे, वहां बलि गधे के रुप में छुपे हुए थें. दोनों की आपस में बातचीत होने लगी. उन दोनों की बातचीत अभी चल ही रही थी, कि उसी समय दैत्यराज बलि के शरीर से एक स्त्री बाहर निकली़, देव राज इन्द्र के पूछने पर स्त्री ने कह की मै, देवी लक्ष्मी हूं, और दैत्यों को छोड्कर, मेरी ओर अग्रसर क्यों हो रही हो. मैं स्वभाव वश एक स्थान पर टिककर नहीं रहती हूं,

परन्तु मैं उसी स्थान पर स्थिर होकर रहती हूँ, जहां सत्य, दान, व्रत, तप, पराक्रम तथा धर्म रह्ते है. जो व्यक्ति सत्यवादी होता है, जितेन्द्रिय होता है, ब्राह्मणों का हितैषी होत है, धम की मर्यादा का पालन करता है, उपवास व तप करता है, प्रतिदिन सूर्योदय से पहले जागता है, और समय से सोता है, दीन- दुखियों, अनाथों, वृ्द्ध, रोगी और शक्तिहीनों को सताते नहीं है.

अपने गुरुओं की आज्ञा का पालन करता है. मित्रों से प्रेम व्यवहार करता है. आलस्य, निद्रा, अप्रसन्नता, असंतोष, कामुकता और विवेकहीनता आदि बुरे गुण जिसमें नहीं होते है. उसी के यहां मैं निवास करती हूँ. इस प्रकार यह स्पष्ट है कि लक्ष्मी जी केवल वहीं स्थायी रुप से निवास करती है, जहां उपरोक्त गुण युक्त व्यक्ति निवास करते है.

धनतेरस (Dhanteras)

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धनतेरस (Dhanteras)

सुख-समृद्धि, यश और वैभव का पर्व धनतेरस के दिन धन के देवता कुबेर और मृत्यु के देवता सुर्यपुत्र यमराज की पूजा का बड़ा महत्व है. हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के त्रयोदशी तिथि को मनाए जाने वाले इस महापर्व के बारे में पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन देवताओं के वैद्य धनवंतरी ऋषि अमृत कलश सहित सागर मंथन से प्रकट हुए थे, जिस कारण इस दिन धनतेरस के साथ-साथ धनवंतरी जयंती भी मनाया जाता है. नई चीजों के शुभ कदम के इस पर्व में मुख्य रूप से नए बर्तन या सोना-चांदी खरीदने की परंपरा है. आस्थावान भक्तों के अनुसार चूंकि जन्म के समय धनवंतरी के हाथों में अमृत का कलश था, इसलिए इस दिन बर्तन खरीदना अति शुभ होता है.

कहा जाता है कि इसी दिन यमराज से राजा हिम के पुत्र की रक्षा उसकी पत्नी ने किया था, जिस कारण दीपावली से दो दिन पहले मनाए जाने वाले ऐश्वर्य का त्यौहार धनतेरस पर सांयकाल को यमदेव के निमित्त दीपदान किया जाता है. इस दिन को यमदीप दान भी कहा जाता है. मान्यता है कि ऐसा करने से यमराज के कोप से सुरक्षा मिलती है और पूरा परिवार स्वस्थ रहता है. चूंकि पीतल भगवान धनवंतरी की धातु मानी जाती है, इसलिए इस दिन पीतल खरीदना भी शुभ माना जाता है. इस दिन घरों को साफ़-सफाई, लीप-पोत कर स्वच्छ और पवित्र बनाया जाता है और फिर शाम के समय रंगोली बना दीपक जलाकर धन और वैभव की देवी मां लक्ष्मी का आवाहन किया जाता है.

श्री बद्रीनाथ जी की आरती (Shri Badrinath Ji Ki Aarti)

जय जय श्री बद्रीनाथ,जयति योग ध्यानी || टेक ||

निर्गुण सगुण स्वरूप, मेधवर्ण अति अनूप |
सेवत चरण स्वरूप, ज्ञानी विज्ञानी | जय…

झलकत है शीश छत्र, छवि अनूप अति विचित्र |
बरनत पावन चरित्र, स्कुचत बरबानी | जय…

तिलक भाल अति विशाल,गल में मणि मुक्त-माल |
प्रनत पल अति दयाल,सेवक सुखदानी | जय….

कानन कुण्डल ललाम,मूरति सुखमा की धाम |
सुमिरत हों सिद्धि काम,कहत गुण बखानी | जय…

गावत गुण शंभु शेष,इन्द्र चन्द्र अरु दिनेश |
विनवत श्यामा हमेश,जोरी जुगल पानी | जय…

श्री केदारनाथ जी की आरती (Shri Kedarnath Ji Ki Aarti)

जय केदार उदार शंकर,मन भयंकर दुःख हरम |

गौरी गणपति स्कन्द नन्दी,श्री केदार नमाम्यहम् |

शैल सुन्दर अति हिमालय, शुभ मन्दिर सुन्दरम |

निकट मन्दाकिनी सरस्वती, जय केदार नमाम्यहम |

उदक कुण्ड है अधम पावन, रेतस कुण्ड मनोहरम |

हंस कुण्ड समीप सुन्दर,जय केदार नमाम्यहम |

अन्नपूरणा सह अर्पणा, काल भैरव शोभितम |

पंच पाण्डव द्रोपदी सह,जय केदार नमाम्यहम |

शिव दिगम्बर भस्मधारी,अर्द्ध चन्द्र विभूषितम |

शीश गंगा कण्ठ फिणिपति,जय केदार नमाम्यहम |

कर त्रिशूल विशाल डमरू,ज्ञान गान विशारदम |

मझहेश्वर तुंग ईश्वर, रुद कल्प महेश्वरम |

पंच धन्य विशाल आलय,जय केदार नमाम्यहम |

नाथ पावन हे विशालम |पुण्यप्रद हर दर्शनम |

जय केदार उदार शंकर,पाप ताप नमाम्यहम ||