शीतला माता मंत्र (Sheetla Mata Mantra)

वन्दे हं शीतलां देवी रासभस्थां दिगम्बराम्।

मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालङ्कृतमस्तकाम्।।

अर्थ है दिगम्बरा, गर्दभ वाहन पर विराजित, शूप, झाड़ू और नीम के पत्तों से सजी-संवरी और हाथों में जल कलश धारण करने वाली माता को प्रणाम हैं।

Advertisements

महाकाली चालीसा(Mahakali Chalisa)

दोहा मात श्री महाकालिका ध्याऊँ शीश नवाय ।

जान मोहि निज दास सब दीजै काज बनाय ॥

नमो महा कालिका भवानी। महिमा अमित न जाय बखानी॥

तुम्हारो यश तिहुँ लोकन छायो। सुर नर मुनिन सबन गुण गायो॥

परी गाढ़ देवन पर जब जब। कियो सहाय मात तुम तब तब॥

महाकालिका घोर स्वरूपा। सोहत श्यामल बदन अनूपा॥

जिभ्या लाल दन्त विकराला। तीन नेत्र गल मुण्डन माला॥

चार भुज शिव शोभित आसन। खड्ग खप्पर कीन्हें सब धारण॥

रहें योगिनी चौसठ संगा। दैत्यन के मद कीन्हा भंगा॥

चण्ड मुण्ड को पटक पछारा। पल में रक्तबीज को मारा॥

दियो सहजन दैत्यन को मारी। मच्यो मध्य रण हाहाकारी॥

कीन्हो है फिर क्रोध अपारा। बढ़ी अगारी करत संहारा॥

देख दशा सब सुर घबड़ाये। पास शम्भू के हैं फिर धाये॥

विनय करी शंकर की जा के। हाल युद्ध का दियो बता के॥

तब शिव दियो देह विस्तारी। गयो लेट आगे त्रिपुरारी॥

ज्यों ही काली बढ़ी अंगारी। खड़ा पैर उर दियो निहारी॥

देखा महादेव को जबही। जीभ काढ़ि लज्जित भई तबही॥

भई शान्ति चहुँ आनन्द छायो। नभ से सुरन सुमन बरसायो॥

जय जय जय ध्वनि भई आकाशा। सुर नर मुनि सब हुए हुलाशा॥

दुष्टन के तुम मारन कारन। कीन्हा चार रूप निज धारण॥

चण्डी दुर्गा काली माई। और महा काली कहलाई॥

पूजत तुमहि सकल संसारा। करत सदा डर ध्यान तुम्हारा॥

मैं शरणागत मात तिहारी। करौं आय अब मोहि सुखारी॥

सुमिरौ महा कालिका माई। होउ सहाय मात तुम आई॥

धरूँ ध्यान निश दिन तब माता। सकल दुःख मातु करहु निपाता॥

आओ मात न देर लगाओ। मम शत्रुघ्न को पकड़ नशाओ॥

सुनहु मात यह विनय हमारी। पूरण हो अभिलाषा सारी॥

मात करहु तुम रक्षा आके। मम शत्रुघ्न को देव मिटा को॥

निश वासर मैं तुम्हें मनाऊं। सदा तुम्हारे ही गुण गाउं॥

दया दृष्टि अब मोपर कीजै। रहूँ सुखी ये ही वर दीजै॥

नमो नमो निज काज सैवारनि। नमो नमो हे खलन विदारनि॥

नमो नमो जन बाधा हरनी। नमो नमो दुष्टन मद छरनी॥

नमो नमो जय काली महारानी। त्रिभुवन में नहिं तुम्हरी सानी॥

भक्तन पे हो मात दयाला। काटहु आय सकल भव जाला॥

मैं हूँ शरण तुम्हारी अम्बा। आवहू बेगि न करहु विलम्बा॥

मुझ पर होके मात दयाला। सब विधि कीजै मोहि निहाला॥

करे नित्य जो तुम्हरो पूजन। ताके काज होय सब पूरन॥

निर्धन हो जो बहु धन पावै। दुश्मन हो सो मित्र हो जावै॥

जिन घर हो भूत बैताला। भागि जाय घर से तत्काला॥

रहे नही फिर दुःख लवलेशा। मिट जाय जो होय कलेशा॥

जो कुछ इच्छा होवें मन में। संशय नहिं पूरन हो छण में॥

औरहु फल संसारिक जेते। तेरी कृपा मिलैं सब तेते॥

दोहा महाकलिका की पढ़ै नित चालीसा जोय।
मनवांछित फल पावहि गोविन्द जानौ सोय॥

काली मंत्र (Kali Mantra)

ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु‍ते।

इष्ट सिद्धि हेतु इष्टदेवता के ‘कुल्लुकादि मंत्रों’ का जप अत्यन्त आवश्यक हैं ।

अज्ञात्वा कुल्लुकामेतां जपते योऽधमः प्रिये ।
पञ्चत्वमाशु लभते सिद्धिहानिश्च जायते ।।

दश महाविद्याओं के कुल्लिकादि अलग-अलग हैं । काली के कुल्लुकादि इस प्रकार हैं –

कुल्लुका मंत्र –
क्रीं, हूं, स्त्रीं, ह्रीं, फट् यह पञ्चाक्षरी मंत्र हैं । मूलमंत्र से षडङ्ग-न्यास करके शिर में १२ बार कुल्लुका मंत्र का जप करें ।

सेतुः-
“ॐ” इस मंत्र को १२ बार हृदय में जपें । ब्राह्मण एवं क्षत्रियों का सेतु मंत्र “ॐ” हैं । वैश्यों के लिये “फट्” तथा शूद्रों के लिये “ह्रीं” सेतु मंत्र हैं । इसका १२ बार हृदय में जप करें ।

महासेतुः-
“क्रीं” इस महासेतु मंत्र को कण्ठ-स्थान में १२ बार जप करें ।

निर्वाण जपः-
मणिपूर-चक्र (नाभि) में – ॐ अं पश्चात् मूलमंत्र के बाद ऐं अं आं इं ईं ऋं ॠं लृं ॡं एं ऐं ओं औं अं अः कं खं गं घं ङ चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं ॐ का जप करें । पश्चात् “क्लीं” बीज को स्वाधिष्ठान चक्र में १२ बार जप करें । इसके बाद “ॐ ऐं ह्रीं शऽरीं क्रीं रां रीं रुं रैं रौं रं रः रमल वरयूं राकिनी मां रक्ष रक्ष मम सर्वधातून् रक्ष रक्ष सर्वसत्व वशंकरि देवि ! आगच्छागच्छ इमां पूजां गृह्ण गृह्ण ऐं घोरे देवि ! ह्रीं सः परम घोरे घोर स्वरुपे एहि एहि नमश्चामुण्डे डरलकसहै श्री दक्षिण-कालिके देवि वरदे विद्ये ! इस मन्त्र का शिर में द्वादश बार जप करें । इसके बाद ‘महाकुण्डलिनी’ का ध्यान कर इष्टमंत्र का जप करना चाहिए । मंत्र सिद्धि के लिये मंत्र के दश संस्कार भी आवश्यक हैं ।

जननं जीवनं पश्चात् ताडनं बोधनं तथा ।
अथाभिषेको विमलीकरणाप्यायनं पुनः ।
तर्पणं दीपनं गुप्तिर्दशैताः मंत्र संस्क्रियाः ।।

श्री झुलेलाल की आरती(ShriJhulelal Ki Aarti)

ॐ जय दूलह देवा, साईं  जय दूलह देवा |

पूजा कनि था प्रेमी, सिदुक रखी सेवा || ॐ जय…

तुहिंजे दर दे केई सजण अचनि  सवाली |

 दान वठन सभु दिलि सां कोन दिठुभ खाली || ॐ जय…

अंधड़नि  खे दिनव अखडियूँ  – दुखियनि  खे दारुं |

पाए मन जूं मुरादूं सेवक कनि थारू || ॐ जय…

फल फूलमेवा सब्जिऊ पोखनि मंझि पचिन |

तुहिजे महिर मयासा  अन्न बि आपर अपार थियनी || ॐ जय…

ज्योति जगे थी जगु में लाल तुहिंजी लाली |

अमरलाल अचु मूं वटी हे विश्व संदा वाली || ॐ जय…

जगु जा जीव सभेई पाणिअ बिन प्यासा|

जेठानंद आनंद कर, पूरन करियो आशा || ॐ जय…

श्री झुलेलाल चालीसा(Shri Jhulelal Chalisa)

ॐ श्री वरुणाय नमः

दोहा 

जय जय जल देवता, जय ज्योति स्वरूप |

अमर उडेरो लाल जय, झुलेलाल अनूप ||

 

चौपाई 

 

रतनलाल रतनाणी नंदन | जयति देवकी सुत जग वंदन ||

दरियाशाह वरुण अवतारी | जय जय लाल साईं सुखकारी ||

जय जय होय धर्म की भीरा | जिन्दा पीर हरे जन पीरा ||

 

संवत दस सौ सात मंझरा | चैत्र शुक्ल द्वितिया भगऊ वारा ||

ग्राम नसरपुर सिंध प्रदेशा | प्रभु अवतरे हरे जन कलेशा ||

 

सिन्धु वीर ठट्ठा राजधानी | मिरखशाह नऊप अति अभिमानी ||

कपटी कुटिल क्रूर कूविचारी | यवन मलिन मन अत्याचारी ||

 

धर्मान्तरण करे सब केरा | दुखी हुए जन कष्ट घनेरा ||

पिटवाया हाकिम ढिंढोरा | हो इस्लाम धर्म चाहुँओरा ||

 

सिन्धी प्रजा बहुत घबराई | इष्ट देव को टेर लगाई ||

वरुण देव पूजे बहुंभाती | बिन जल अन्न गए दिन राती ||

 

सिन्धी तीर सब दिन चालीसा | घर घर ध्यान लगाये ईशा ||

गरज उठा नद सिन्धु सहसा | चारो और उठा नव हरषा ||

 

वरुणदेव ने सुनी पुकारा | प्रकटे वरुण मीन असवारा ||

दिव्य पुरुष जल ब्रह्मा स्वरुपा | कर पुष्तक नवरूप अनूपा ||

 

हर्षित हुए सकल नर नारी | वरुणदेव की महिमा न्यारी ||

जय जय कार उठी चाहुँओरा |  गई रात आने को भौंरा || 

 

मिरखशाह नऊप अत्याचारी | नष्ट करूँगा शक्ति सारी ||

 दूर अधर्म, हरण भू भारा | शीघ्र नसरपुर में अवतारा ||

 

रतनराय रातनाणी आँगन | खेलूँगा, आऊँगा शिशु बन ||

रतनराय घर ख़ुशी आई | झुलेलाल अवतारे सब देय बधाई ||

घर घर मंगल गीत सुहाए | झुलेलाल हरन दुःख आए ||

मिरखशाह तक चर्चा आई | भेजा मंत्री क्रोध अधिकाई ||

मंत्री ने जब बाल निहारा | धीरज गया हृदय का सारा ||

 

देखि मंत्री साईं की लीला | अधिक विचित्र विमोहन शीला ||

बालक धीखा युवा सेनानी | देखा मंत्री बुद्धि चाकरानी ||

  

योद्धा रूप दिखे भगवाना | मंत्री हुआ विगत अभिमाना ||

झुलेलाल दिया आदेशा | जा तव नऊपति कहो संदेशा ||

 

मिरखशाह नऊप  तजे गुमाना | हिन्दू मुस्लिम एक समाना ||

बंद करो नित्य अत्याचारा | त्यागो धर्मान्तरण विचारा || 

 

लेकिन मिरखशाह अभिमानी | वरुणदेव की बात न मानी ||

एक दिवस हो अश्व सवारा | झुलेलाल गए दरबारा ||

 

मिरखशाह नऊप ने आज्ञा दी | झुलेलाल बनाओ बन्दी ||

 

किया स्वरुप वरुण का धारण | चारो और हुआ जल प्लावन ||

दरबारी डूबे उतराये | नऊप के होश ठिकाने आये ||

 

नऊप तब पड़ा चरण में आई | जय जय धन्य जय साईं ||

वापिस लिया नऊपति आदेशा | दूर दूर सब जन क्लेशा ||

संवत दस सौ बीस मंझारी | भाद्र शुक्ल चौदस शुभकारी ||

 

भक्तो की हर आधी व्याधि | जल में ली जलदेव समाधि ||

जो जन धरे आज भी ध्याना | उनका वरुण करे कल्याणा || 

 

दोहा 

चालीसा चालीस दिन पाठ करे जो कोय |

पावे मनवांछित फल अरु जीवन सुखमय होय ||

श्री सांईबाबा की आरती (Shree Sai Baba Ki Aarti)

आरती श्री साई गुरुवर की, परमानंद सदा गुरुवर की |

जाकी कृपा विपुल सुखकारी, दु:ख शोक संकट भयहारी |

शिरडी में अवतार रचाया, चमत्कार से तत्व दिखाया |

कितने भक्त शरण में आये, वे सुख शंति निरंतर पाये |

भाव धरे जो मन में जैसा, साई का अनुभव वैसा |

गुरु की उदी लगावे तन को, समाधान लाभत उस तन को |

साई नाम सदा जो गावें, सो फल जग में शाश्वत पावें |

गुरुवासर करि पूजा सेवा, उस पर कृपा करत गुरु देवा |

राम कृष्ण हनुमान रुप में, दे दर्शन जानत जो मन में |

विविध धर्म के सेवक आतें, दर्शन कर इच्छित फल पातें |

जै बोलो साई बाबा की, जै बोलो अवधूत गुरु की |

साई की आरती जो कोई गावे, घर में बसि सुख मंगल पावे |

आरती श्री साई….

अनंत कोटि ब्रह्माण्ड़ नायक, राजाधिराज योगीराज

जय जय जय साई बाबा की

आरती श्री साई गुरुवर की…….

श्री साईं चालीसा (Shri Sai Chalisa)

|| चौपाई ||

पहले साई के चरणों में, अपना शीश नमाऊं मैं।

कैसे शिरडी साई आए, सारा हाल सुनाऊं मैं॥

 

कौन है माता, पिता कौन है, ये न किसी ने भी जाना।

कहां जन्म साई ने धारा, प्रश्न पहेली रहा बना॥

 

कोई कहे अयोध्या के, ये रामचंद्र भगवान हैं।

कोई कहता साई बाबा, पवन पुत्र हनुमान हैं॥

 

कोई कहता मंगल मूर्ति, श्री गजानंद हैं साई।

कोई कहता गोकुल मोहन, देवकी नन्दन हैं साई॥

 

शंकर समझे भक्त कई तो, बाबा को भजते रहते।

कोई कह अवतार दत्त का, पूजा साई की करते॥

 

कुछ भी मानो उनको तुम, पर साई हैं सच्चे भगवान।

ब़ड़े दयालु दीनबं़धु, कितनों को दिया जीवन दान॥

 

कई वर्ष पहले की घटना, तुम्हें सुनाऊंगा मैं बात।

किसी भाग्यशाली की, शिरडी में आई थी बारात॥

 

आया साथ उसी के था, बालक एक बहुत सुन्दर।

आया, आकर वहीं बस गया, पावन शिरडी किया नगर॥

 

कई दिनों तक भटकता, भिक्षा माँग उसने दर-दर।

और दिखाई ऐसी लीला, जग में जो हो गई अमर॥

 

जैसे-जैसे अमर उमर ब़ढ़ी, ब़ढ़ती ही वैसे गई शान।

घर-घर होने लगा नगर में, साई बाबा का गुणगान॥

 

दिग् दिगंत में लगा गूंजने, फिर तो साई जी का नाम।

दीन-दुखी की रक्षा करना, यही रहा बाबा का काम॥

 

बाबा के चरणों में जाकर, जो कहता मैं हूं नि़धOन।

दया उसी पर होती उनकी, खुल जाते दुःख के बंधन॥

 

कभी किसी ने मांगी भिक्षा, दो बाबा मुझको संतान।

एवं अस्तु तब कहकर साई, देते थे उसको वरदान॥

 

स्वयं दुःखी बाबा हो जाते, दीन-दुःखी जन का लख हाल।

अन्तःकरण श्री साई का, सागर जैसा रहा विशाल॥

 

भक्त एक मद्रासी आया, घर का बहुत ब़ड़ा ़धनवान।

माल खजाना बेहद उसका, केवल नहीं रही संतान॥

 

लगा मनाने साईनाथ को, बाबा मुझ पर दया करो।

झंझा से झंकृत नैया को, तुम्हीं मेरी पार करो॥

 

कुलदीपक के बिना अं़धेरा, छाया हुआ घर में मेरे।

इसलिए आया हँू बाबा, होकर शरणागत तेरे॥

 

कुलदीपक के अभाव में, व्यर्थ है दौलत की माया।

आज भिखारी बनकर बाबा, शरण तुम्हारी मैं आया॥

 

दे-दो मुझको पुत्र-दान, मैं ऋणी रहूंगा जीवन भर।

और किसी की आशा न मुझको, सिर्फ भरोसा है तुम पर॥

 

अनुनय-विनय बहुत की उसने, चरणों में ़धर के शीश।

तब प्रसन्न होकर बाबा ने , दिया भक्त को यह आशीश॥

 

`अल्ला भला करेगा तेरा´ पुत्र जन्म हो तेरे घर।

कृपा रहेगी तुझ पर उसकी, और तेरे उस बालक पर॥

 

अब तक नहीं किसी ने पाया, साई की कृपा का पार।

पुत्र रत्न दे मद्रासी को, धन्य किया उसका संसार॥

 

तन-मन से जो भजे उसी का, जग में होता है उद्धार।

सांच को आंच नहीं हैं कोई, सदा झूठ की होती हार॥

 

मैं हूं सदा सहारे उसके, सदा रहूँगा उसका दास।

साई जैसा प्रभु मिला है, इतनी ही कम है क्या आस॥

 

मेरा भी दिन था एक ऐसा, मिलती नहीं मुझे रोटी।

तन पर कप़ड़ा दूर रहा था, शेष रही नन्हीं सी लंगोटी॥

 

सरिता सन्मुख होने पर भी, मैं प्यासा का प्यासा था।

दुिर्दन मेरा मेरे ऊपर, दावाग्नी बरसाता था॥

 

धरती के अतिरिक्त जगत में, मेरा कुछ अवलम्ब न था।

बना भिखारी मैं दुनिया में, दर-दर ठोकर खाता था॥

 

ऐसे में एक मित्र मिला जो, परम भक्त साई का था।

जंजालों से मुक्त मगर, जगती में वह भी मुझसा था॥

 

बाबा के दर्शन की खातिर, मिल दोनों ने किया विचार।

साई जैसे दया मूर्ति के, दर्शन को हो गए तैयार॥

 

पावन शिरडी नगर में जाकर, देख मतवाली मूरति।

धन्य जन्म हो गया कि हमने, जब देखी साई की सूरति॥

 

जब से किए हैं दर्शन हमने, दुःख सारा काफूर हो गया।

संकट सारे मिटै और, विपदाओं का अन्त हो गया॥

 

मान और सम्मान मिला, भिक्षा में हमको बाबा से।

प्रतिबिम्‍िबत हो उठे जगत में, हम साई की आभा से॥

 

बाबा ने सन्मान दिया है, मान दिया इस जीवन में।

इसका ही संबल ले मैं, हंसता जाऊंगा जीवन में॥

 

साई की लीला का मेरे, मन पर ऐसा असर हुआ।

लगता जगती के कण-कण में, जैसे हो वह भरा हुआ॥

 

`काशीराम´ बाबा का भक्त, शिरडी में रहता था।

मैं साई का साई मेरा, वह दुनिया से कहता था॥

 

सीकर स्वयंं वस्त्र बेचता, ग्राम-नगर बाजारों में।

झंकृत उसकी हृदय तंत्री थी, साई की झंकारों में॥

 

स्तब़्ध निशा थी, थे सोय,े रजनी आंचल में चाँद सितारे।

नहीं सूझता रहा हाथ को हाथ तिमिर के मारे॥

 

वस्त्र बेचकर लौट रहा था, हाय ! हाट से काशी।

विचित्र ब़ड़ा संयोग कि उस दिन, आता था एकाकी॥

 

घेर राह में ख़ड़े हो गए, उसे कुटिल अन्यायी।

मारो काटो लूटो इसकी ही, ध्वनि प़ड़ी सुनाई॥

 

लूट पीटकर उसे वहाँ से कुटिल गए चम्पत हो।

आघातों में मर्माहत हो, उसने दी संज्ञा खो॥

 

बहुत देर तक प़ड़ा रह वह, वहीं उसी हालत में।

जाने कब कुछ होश हो उठा, वहीं उसकी पलक में॥

 

अनजाने ही उसके मुंह से, निकल प़ड़ा था साई।

जिसकी प्रतिध्वनि शिरडी में, बाबा को प़ड़ी सुनाई॥

 

क्षुब़्ध हो उठा मानस उनका, बाबा गए विकल हो।

लगता जैसे घटना सारी, घटी उन्हीं के सन्मुख हो॥

 

उन्मादी से इ़धर-उ़धर तब, बाबा लेगे भटकने।

सन्मुख चीजें जो भी आई, उनको लगने पटकने॥

 

और ध़धकते अंगारों में, बाबा ने अपना कर डाला।

हुए सशंकित सभी वहाँ, लख ताण्डवनृत्य निराला॥

 

समझ गए सब लोग, कि कोई भक्त प़ड़ा संकट में।

क्षुभित ख़ड़े थे सभी वहाँ, पर प़ड़े हुए विस्मय में॥

 

उसे बचाने की ही खातिर, बाबा आज विकल है।

उसकी ही पी़ड़ा से पीडित, उनकी अन्तःस्थल है॥

 

इतने में ही विविध ने अपनी, विचित्रता दिखलाई।

लख कर जिसको जनता की, श्रद्धा सरिता लहराई॥

 

लेकर संज्ञाहीन भक्त को, गा़ड़ी एक वहाँ आई।

सन्मुख अपने देख भक्त को, साई की आंखें भर आई॥

 

शांत, धीर, गंभीर, सिन्धु सा, बाबा का अन्तःस्थल।

आज न जाने क्यों रह-रहकर, हो जाता था चंचल॥

 

आज दया की मू स्वयं था, बना हुआ उपचारी।

और भक्त के लिए आज था, देव बना प्रतिहारी॥

 

आज भिक्त की विषम परीक्षा में, सफल हुआ था काशी।

उसके ही दर्शन की खातिर थे, उम़ड़े नगर-निवासी।

 

जब भी और जहां भी कोई, भक्त प़ड़े संकट में।

उसकी रक्षा करने बाबा, आते हैं पलभर में॥

 

युग-युग का है सत्य यह, नहीं कोई नई कहानी।

आपतग्रस्त भक्त जब होता, जाते खुद अन्र्तयामी॥

 

भेदभाव से परे पुजारी, मानवता के थे साई।

जितने प्यारे हिन्दू-मुस्लिम, उतने ही थे सिक्ख ईसाई॥

 

भेद-भाव मंदिर-मिस्जद का, तोड़-फोड़ बाबा ने डाला।

राह रहीम सभी उनके थे, कृष्ण करीम अल्लाताला॥

 

घण्टे की प्रतिध्वनि से गूंजा, मिस्जद का कोना-कोना।

मिले परस्पर हिन्दू-मुस्लिम, प्यार बढ़ा दिन-दिन दूना॥

 

चमत्कार था कितना सुन्दर, परिचय इस काया ने दी।

और नीम कडुवाहट में भी, मिठास बाबा ने भर दी॥

 

सब को स्नेह दिया साई ने, सबको संतुल प्यार किया।

जो कुछ जिसने भी चाहा, बाबा ने उसको वही दिया॥

 

ऐसे स्नेहशील भाजन का, नाम सदा जो जपा करे।

पर्वत जैसा दुःख न क्यों हो, पलभर में वह दूर टरे॥

 

साई जैसा दाता हमने, अरे नहीं देखा कोई।

जिसके केवल दर्शन से ही, सारी विपदा दूर गई॥

 

तन में साई, मन में साई, साई-साई भजा करो।

अपने तन की सुधि-बुधि खोकर, सुधि उसकी तुम किया करो॥

 

जब तू अपनी सुधि तज, बाबा की सुधि किया करेगा।

और रात-दिन बाबा-बाबा, ही तू रटा करेगा॥

 

तो बाबा को अरे ! विवश हो, सुधि तेरी लेनी ही होगी।

तेरी हर इच्छा बाबा को पूरी ही करनी होगी॥

 

जंगल, जगंल भटक न पागल, और ढूंढ़ने बाबा को।

एक जगह केवल शिरडी में, तू पाएगा बाबा को॥

 

धन्य जगत में प्राणी है वह, जिसने बाबा को पाया।

दुःख में, सुख में प्रहर आठ हो, साई का ही गुण गाया॥

 

गिरे संकटों के पर्वत, चाहे बिजली ही टूट पड़े।

साई का ले नाम सदा तुम, सन्मुख सब के रहो अड़े॥

 

इस बूढ़े की सुन करामत, तुम हो जाओगे हैरान।

दंग रह गए सुनकर जिसको, जाने कितने चतुर सुजान॥

 

एक बार शिरडी में साधु, ढ़ोंगी था कोई आया।

भोली-भाली नगर-निवासी, जनता को था भरमाया॥

 

जड़ी-बूटियां उन्हें दिखाकर, करने लगा वह भाषण।

कहने लगा सुनो श्रोतागण, घर मेरा है वृन्दावन॥

 

औषधि मेरे पास एक है, और अजब इसमें शिक्त।

इसके सेवन करने से ही, हो जाती दुःख से मुिक्त॥

 

अगर मुक्त होना चाहो, तुम संकट से बीमारी से।

तो है मेरा नम्र निवेदन, हर नर से, हर नारी से॥

 

लो खरीद तुम इसको, इसकी सेवन विधियां हैं न्यारी।

यद्यपि तुच्छ वस्तु है यह, गुण उसके हैं अति भारी॥

 

जो है संतति हीन यहां यदि, मेरी औषधि को खाए।

पुत्र-रत्न हो प्राप्त, अरे वह मुंह मांगा फल पाए॥

 

औषधि मेरी जो न खरीदे, जीवन भर पछताएगा।

मुझ जैसा प्राणी शायद ही, अरे यहां आ पाएगा॥

 

दुनिया दो दिनों का मेला है, मौज शौक तुम भी कर लो।

अगर इससे मिलता है, सब कुछ, तुम भी इसको ले लो॥

 

हैरानी बढ़ती जनता की, लख इसकी कारस्तानी।

प्रमुदित वह भी मन- ही-मन था, लख लोगों की नादानी॥

 

खबर सुनाने बाबा को यह, गया दौड़कर सेवक एक।

सुनकर भृकुटी तनी और, विस्मरण हो गया सभी विवेक॥

 

हुक्म दिया सेवक को, सत्वर पकड़ दुष्ट को लाओ।

या शिरडी की सीमा से, कपटी को दूर भगाओ॥

 

मेरे रहते भोली-भाली, शिरडी की जनता को।

कौन नीच ऐसा जो, साहस करता है छलने को॥

 

पलभर में ऐसे ढोंगी, कपटी नीच लुटेरे को।

महानाश के महागर्त में पहुँचा, दूँ जीवन भर को॥

 

तनिक मिला आभास मदारी, क्रूर, कुटिल अन्यायी को।

काल नाचता है अब सिर पर, गुस्सा आया साई को॥

 

पलभर में सब खेल बंद कर, भागा सिर पर रखकर पैर।

सोच रहा था मन ही मन, भगवान नहीं है अब खैर॥

 

सच है साई जैसा दानी, मिल न सकेगा जग में।

अंश ईश का साई बाबा, उन्हें न कुछ भी मुश्किल जग में॥

 

स्नेह, शील, सौजन्य आदि का, आभूषण धारण कर।

बढ़ता इस दुनिया में जो भी, मानव सेवा के पथ पर॥

 

वही जीत लेता है जगती के, जन जन का अन्तःस्थल।

उसकी एक उदासी ही, जग को कर देती है वि£ल॥

 

जब-जब जग में भार पाप का, बढ़-बढ़ ही जाता है।

उसे मिटाने की ही खातिर, अवतारी ही आता है॥

 

पाप और अन्याय सभी कुछ, इस जगती का हर के।

दूर भगा देता दुनिया के, दानव को क्षण भर के॥

 

ऐसे ही अवतारी साई, मृत्युलोक में आकर।

समता का यह पाठ पढ़ाया, सबको अपना आप मिटाकर ॥

 

नाम द्वारका मिस्जद का, रखा शिरडी में साई ने।

दाप, ताप, संताप मिटाया, जो कुछ आया साई ने॥

 

सदा याद में मस्त राम की, बैठे रहते थे साई।

पहर आठ ही राम नाम को, भजते रहते थे साई॥

 

सूखी-रूखी ताजी बासी, चाहे या होवे पकवान।

सौदा प्यार के भूखे साई की, खातिर थे सभी समान॥

 

स्नेह और श्रद्धा से अपनी, जन जो कुछ दे जाते थे।

बड़े चाव से उस भोजन को, बाबा पावन करते थे॥

 

कभी-कभी मन बहलाने को, बाबा बाग में जाते थे।

प्रमुदित मन में निरख प्रकृति, छटा को वे होते थे॥

 

रंग-बिरंगे पुष्प बाग के, मंद-मंद हिल-डुल करके।

बीहड़ वीराने मन में भी स्नेह सलिल भर जाते थे॥

 

ऐसी समुधुर बेला में भी, दुख आपात, विपदा के मारे।

अपने मन की व्यथा सुनाने, जन रहते बाबा को घेरे॥

 

सुनकर जिनकी करूणकथा को, नयन कमल भर आते थे।

दे विभूति हर व्यथा, शांति, उनके उर में भर देते थे॥

 

जाने क्या अद्भुत शिक्त, उस विभूति में होती थी।

जो धारण करते मस्तक पर, दुःख सारा हर लेती थी॥

 

धन्य मनुज वे साक्षात् दर्शन, जो बाबा साई के पाए।

धन्य कमल कर उनके जिनसे, चरण-कमल वे परसाए॥

 

काश निर्भय तुमको भी, साक्षात् साई मिल जाता।

वर्षों से उजड़ा चमन अपना, फिर से आज खिल जाता॥

 

गर पकड़ता मैं चरण श्री के, नहीं छोड़ता उम्रभर॥

 

मना लेता मैं जरूर उनको, गर रूठते साई मुझ पर॥

 

|| इति श्री साईं चालीसा समाप्त ||